History of Bijnor an Indian District
बिजनौर, हिमालय की उपत्यका में स्थित l जहाँ गंगा पहली बार अपने विस्तार को पाती है , मानों शिव कि जटाओं से बाहर निकलकर उन्मुक्तता का आनंद लेती है l कालिदास का जन्म भले ही कहीं और हुआ हो, किंतु उन्होंने अपने प्रसिद्द महाकाव्य “अभिज्ञान शाकुंतलम” में इस जनपद में बहने वाली मालिनी नदी को बनाया।
जिस महाप्रतापी राजा भरत के नाम पर विश्व भारत को जानता है, यह वही शस्य श्यामला भूमि है जिस राज में पलकर भरत महाप्रतापी बने ।
बिजनौर की इस पुण्य भूमि को को जहाँ एक ओर महाराजा दुष्यन्त, परमसंत ऋषि कण्व और महात्मा विदुर की कर्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है, वहीं आर्य जगत के प्रकाश स्तम्भ स्वामी श्रद्धानन्द, अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक डॉ॰ आत्माराम, भारत के प्रथम इंजीनियर राजा ज्वालाप्रसाद आदि की जन्मभूमि होने का सौभाग्य भी प्राप्त है।
बिजनौर जनपद के प्राचीन इतिहास को स्पष्ट करने के लिए बहतु अधिक ऐतिहासिक एवं पौराणिक प्रमाण नहीं मिलते हैं लेकिन सबसे पहले भूमि का संदर्भ रामायण काल मे आता है । वाल्मीकि रामायण मे इस क्षेत्र को प्रलंब तथा उत्तरी कारापथ कहा गया है । भगवान श्रीराम जी के छोटे भाई शेषावतार भगवान लक्ष्मण जी के पुत्रों मे एक परम् प्रतापी चन्द्रकेतु को इसी उत्तरापथ का राज्य सौंपा गया था। उत्तरी कारापथ बिजनौर के मैदानों से लेकर श्रीनगर गढ़वाल तक का सम्पूर्ण क्षेत्र प्राचीन काल मे लक्ष्मण जी के पुत्रों के अधिकार मे रहा था । उत्तरी करप्ट का उल्लेख अनेक ग्रंथों में मिलता है जिसे श्रेष्ठ उपजाऊ भूमि के रूप में ब्राह्मणों ने इंगित किया है ।
शिवालिक पर्वत श्रेणी के पाद प्रदेश में हेमकूट और मणिकूट पर्वतों की गोद में स्तिथ 'कण्वाश्रम' ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। माना जाता है कि यही कण्व ऋषि का आश्रम था
पौराणिक उल्लेख: कोटद्वार भाबर क्षेत्र की प्रमुख एतिहासिक धरोहरों में 'कण्वाश्रम' सर्वप्रमुख है, जिसका पुराणों में विस्तृत उल्लेख मिलता है। हज़ारों वर्ष पूर्व पौराणिक युग में जिस मालिनी नदी का उल्लेख मिलता है, वह आज भी उसी नाम से पुकारी जाती है तथा भाबर के बहुत बड़े क्षेत्र को सिंचित कर रही है। कण्वाश्रम शिवालिक की तलहटी में मालिनी के दोनों तटों पर स्थित छोटे-छोटे आश्रमों का प्रख्यात विद्यापीठ था। यहां मात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा थी। इसमें वे शिक्षार्थी प्रविष्ट हो सकते थे, जो सामान्य विद्यापीठ का पाठ्यक्रम पूर्ण कर और अधिक अध्ययन करना चाहते थे। कण्वाश्रम चारों वेदों, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष, आयुर्वेद, शिक्षा तथा कर्मकाण्ड इन छ: वेदांगों के अध्ययन-अध्यापन का प्रबन्ध था। आश्रमवर्ती योगी एकान्त स्थानों में कुटी बनाकर या गुफ़ाओं के अन्दर रहते थे। 'अभिज्ञान शाकुन्तलम' में कण्वाश्रम का परिचय इस प्रकार है- "एस कण्व खलु कुलाधिपति आश्रम"
प्राचीन काल से ही मानसखंड तथा केदारखंड की यात्राएं श्रद्धालुओं द्वारा पैदल संपन्न की जाती थीं। हरिद्वार, गंगाद्वार से कण्वाश्रम, महावगढ़, ब्यासघाट, देवप्रयाग होते हुए चारधाम यात्रा अनेक कष्ट सहकर पूर्ण की जाती थी। 'स्कन्द पुराण' केदारखंड के 57वें अध्याय में इस पुण्य क्षेत्र का उल्लेख निम्न प्रकार से किया गया है- कण्वाश्रम समारम्य याव नंदा गिरी भवेत। यावत क्षेत्रम परम पुण्य मुक्ति प्रदायक॥
इसी प्रकार महाभारत, वनपर्व में धर्मारण्य में कण्वाश्रम की स्थिति बताई गयी है- 'कण्वाश्रम ततो गच्छेच्छ्रीजुष्ट लोक पूजितम्'।
स्थानीय जनश्रुति में बिजनौर के निकट गंगातटीय वन में महाभारत काल में मयदानव का निवास स्थान था। भीम की पत्नी हिडिंबा मयदानव की पुत्री थी और भीम से उसने इसी वन में विवाह किया था। यहीं घटोत्कच का जन्म हुआ था। नगर के पश्चिमांत में एक स्थान है जिसे हिडिंबा और पिता मयदानव के इष्टदेव शिव का प्राचीन देवालय कहा जाता है। मेरठ या मयराष्ट्र बिजनौर के निकट गंगा के उस पार है।
कुछ लोगों का कहना है कि बिजनौर की स्थापना राजा बेन ने की थी जो पंखे या बीजन बेचकर अपना निजी ख़र्च चलाता था और बीजन से ही बिजनौर का नामकरण हुआ।
वैसे तो इस क्षेत्र मे क्षत्रिय वर्ण के कई वंश अलग - अलग समयावधि पर छोटे बड़े राज्यों और रियासतों के अधिकार मे रहें हैं जिनमे से अधिकांश दसवीं शताब्दी के बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आये थे, लेकिन यह क्षेत्र भगवान लक्ष्मण जी के वंशज तथा कौशल अथवा कौशल्य गोत्र के रघुवंशी राजपूतो का मूल स्थान है । कौशल अथवा कौशल्य गोत्र के रघुवंशी क्षत्रिय आज भी बड़ी संख्या मे इस क्षेत्र के अनेक गाँव तथा कस्बों मे रहते हैं । कण्व आश्रम की तरह विदुर कुटी का पौराणिक दृष्टि से बहुत महत्व है। यह स्थान बिजनौर को प्रत्यक्ष रूप से महाभारत काल से जोड़ता है '। किवदन्ति है कि महाभारत काल में सुप्रसिद्ध नीतिज्ञ गगां के तट पर अवस्थित था। ऐसी मान्यता है कि कृष्ण जी जव हस्तिनापुर में कौरवों को समझाने में असफल रहे थे तो वह कौरवों की मांगों को ठुकराकर गंगा पार करके महात्मा विदुर के आश्रम में आये थे। यहीं पर अवस्थित दारानगर गंज अपने पौराणिक महत्व के लिए जाना जाता है, जानकारों के मुताबिक इस स्थल का संबंध महाभारत काल से है। कहा जाता है कौरवो-पांडवो के मध्य युद्ध छिड़ने से पहले हस्तिनापुर की महिलाओं और बच्चों को यहां स्थित विदुर कुटी के संरक्षण में यहां बसाया गया था। हस्तिनापुर की महिलाओं के यहां बसने से कारण इस स्थल का नाम पड़ा 'दारानगर'।
महाभारत के युद्ध के बाद हस्तिनापुर और मध्यकाल तक यहां दारानगर मे विदुरकुटी के गंगा तट पर युद्ध प्रदर्शन के रूप मे क्षत्रियों का मेला भी लगता था, जिसे अपभ्रंश रूप मे छड़ियों का मेला भी कहा जाता है । इस मेले मे युद्ध एवं मल्ल युद्ध के प्रदर्शन हेतु देशभर के क्षत्रिय राजा भाग लिया करते थे । महाजनपद काल में भी यह स्थान अत्यंत प्रसिद्द रहा है ।
बुद्धकालीन भारत में भी चीनी यात्री ह्वेनसांग ने छह महीने मतिपुरा (मंडावर) में व्यतीत किए। सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के बाद राजपूत राजाओं ने इस पर अपना अधिकार किया। पृथ्वीराज और जयचंद की पराजय के बाद भारत में तुर्क साम्राज्य की स्थापना हुई, उस समय यह क्षेत्र दिल्ली सल्तनत का एक हिस्सा रहा। तत्कालीन प्रमाणों में इस क्षेत्र को 'कटेहर क्षेत्र कहा जाता था।
कहा जाता है कि सुल्तान इल्तुतमिश स्वयं साम्राज्य-विरोधियों को दंडित करने के लिए यहाँ आया था। मंडावर में उसके द्वारा बनाई गई मस्ज़िद आज तक भी है। औरंगजेब के शासनकाल में इस जनपद पर अफ़गानों का अधिकार था। ये अफ़गानिस्तान के 'रोह' कस्बे से संबंधित थे अत: ये अफ़गान रोहेले कहलाए और उनका शासित क्षेत्र रुहेलखंड कहलाया।
नजीबुद्दौला प्रसिद्ध रोहेला शासक था, जिसने 'पत्थरगढ़ का किला' को अपनी राजधानी बनाया। नजीबाबाद शहर से लगभग दो किलोमीटर दूर बने इस किले को लोग सुल्ताना डाकू के किले के रूप में जानते हैं। किले का निर्माण 1755 में नजीबाबाद के नवाब नजीबुद्दौला ने कराया था और उन्होंने ही अपने नाम पर नजीजाबाद शहर बसाया। असल में नजीबुद्दौला का नाम नजीब खां था। नजीबुद्दौला का खिताब उन्हें मुगलों के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर के दरबार से मिला था। यह किला लगभग चालीस एकड़ भूमि पर बना है। इस किले के निर्माण में मोरध्वज से लाए गए पत्थरों का भी इस्तेमाल हुआ था। इसलिए इसे मोरध्वज किले के नाम से भी जाना जाता हैं। बाद में इसके आसपास की आबादी इसी शासक के नाम पर नजीबाबाद कहलाई। इस क्षेत्र में कई राजपूत रियासतें भी रही जिसमें हल्दौर, राजा का ताजपुर, शेरकोट आदि प्रमुख थी वहीं साहनपुर जाट रियासत थी। रोहेलों से यह क्षेत्र अवध के नवाब के पास आया, जिसे सन् 1801 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ले लिया।
भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम में जनपद ने अविस्मरणीय योगदान दिया। आज़ादी की लड़ाई के समय सर सैय्यद अहमद खाँ यहीं पर कार्यरत थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'तारीक सरकशी-ए-बिजनौर' उस समय के इतिहास पर लिखा गया महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
जनपद के एक ग्राम पैजनियां के चौधरी शिवचरण सिंह त्यागी (1896-1985) के यहां रहकर कुछ समय तक प्रसिद्ध क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद, पं॰ रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्लाह खाँ, ठाकुर रोशन सिंह ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध क्रान्ति की ज्वाला को जलाये रखा।
साहित्य के क्षेत्र में जनपद ने कई महत्त्वपूर्ण मानदंड स्थापित किए हैं। अकबर के नवरत्नों में अबुल फ़जल और फैज़ी का पालन-पोषण बिजनोर के एक कसबे बास्टा के पास हुआ था ।
उर्दू साहित्य में भी जनपद बिजनौर का गौरवशाली स्थान रहा है। क़ायम चाँदपुरी को मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी उस्ताद शायरों में शामिल किया है। नूर बिजनौरी, रिफत सरोश, कौसर चांदपुरी, डिप्टी नजीर अहमद, अख्तर उल इमान, सज्जाद हैदर यलदरम, शेख़ नगीनवी विश्वप्रसिद्ध शायर व लेखक इसी मिट्टी से पैदा हुए।
महारनी विक्टोरिया के उस्ताद नवाब शाहमत अली भी मंडावर,बिजनौर के निवासी थे, जिन्होंने महारानी को फ़ारसी की पढ़ाया। संपादकाचार्य पं. रुद्रदत्त शर्मा, बिहारी सतसई की तुलनात्मक समीक्षा लिखने वाले पं. पद्मसिंह शर्मा और हिंदी-ग़ज़लों के शहंशाह दुष्यंत कुमार भी बिजनौर की धरती की देन हैं। इसके अलावा कुअर्त उल ऐन हैदर, निश्तर ख़ानक़ाही, रामगोपाल विद्यालंकार, हरिदत्त शर्मा, फतहचंद शर्मा आराधक, पत्रकार बाबूसिंह चौहान,राजेंद्र पाल सिंह कश्यप संपादक उत्तर भारत टाइम्स, शायर चंद्रप्रकाश जौहर, महेंद्र अश्क, व्यंग्यकार रवींद्रनाथ त्यागी, साहित्यकार डॉ भोलानाथ त्यागी तथा डॉ उषा त्यागी, प्रकाशक, संपादक, कहानीकार, रूपककार अमन कुमार त्यागी, कथाकार एवं पत्रकार डॉ॰ महावीर अधिकारी, डॉ॰ गिरिराजशरण अग्रवाल, रिफत सरोश,अख्तर उल इमान, शेख़ नगीनवी, अब्दुल रहमान बिजनौरी, कौसर चांदपुरी, खालिद अल्वी इसके अतिरिक्त फ़िल्म निर्माता प्रकाश मेहरा, राजनीतिज्ञ चरन सिंह, अभिनेता विशाल भारद्वाज, फुटबॉल खिलाड़ी हरपाल सिंह, संविधान विशेषग्य श्री सुभाष कश्यप, श्री शांति भूषन का जन्म भी बिजनौर में हुआ था।
बिजनौर का भौगोलिक क्षेत्रफल ६५६१ वर्ग कि॰मी॰ है। उत्तर से दक्षिण इसकी लंबाई लगभग ९९.२ किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम चौड़ाई ८९.६ किलोमीटर है। संपूर्ण जिला 5 तहसीलों में बँटा हुआ है-चाँदपुर, बिजनोर,नगीना, धामपुर, नजीबाबाद पर्वतीय भाग : उत्तरी भाग पहाड़ी है तथा भूमि पथरीली है। तराई का भाग : पर्वतीय भाग के दक्षिण में पूर्व से पश्चिम तक फैला हुआ वन- भाग तराई के नाम से जाना जाता है। यह पहाड़ की तलहटी भी कहलाता है। खादर का भाग : गंगा तथा रामगंगा आदि बड़ी-बड़ी नदियों का तटीय भाग 'खादर' कहलाता है। यह आर्द्र भाग है। बाँगर भाग : यह जनपद का चौरस या खुला मैदानी भाग है, इसे बाँगर भी कहते हैं। इसमें गेंहूँ, चावल, गन्ना, कपास की अच्छी खेती होती है। भूड़ भाग : जनपद का दक्षिणी भाग रेतीला है। इसमें भूड़ और सवाई भूड़ दो प्रकार की मिट्टी पाई जाती है। बिजनौर में कृषि प्रमुख है। यहाँ पर रबी, ख़रीफ़, ज़ायद आदि की प्रमुख फ़सलें होती हैं, जिनमें गन्ना, गेहूँ, चावल, मूँगफली की मुख्य उपज होती हैं। बिजनौर जनपद में हिंदू, इस्लाम, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि धर्मावलंबी रहते हैं। हिंदुओं में रवां राजपूत, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अनेक जाति-उपजातियाँ हैं। प्रमुख रूप से भुइयार (हिन्दु जुलाहा), ब्राह्मण, राजपूत, जाट, गूजर, अहीर, त्यागी, रवा राजपूत, बनिया (वैश्य), चमार, कायस्थ, खत्री आदि उपजातियाँ हैं। कार्य एवं व्यवसाय के आधार पर भी अनेक उपजातियों का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। भुइयार (हिन्दु जुलाहा), बढ़ई, कुम्हार, लुहार, सुनार, रंगरेज (छीपी), तेली, गडरिया, धींवर, नाई, धोबी, माली, बागवान, भड़भूजा, खुमरा, धुना, सिंगाडि़या, कंजर, मनिहार आदि प्रमुख हैं। मुसलमानों में शेख, सैयद, मुग़ल, पठान, अंसारी, सक्का, रांघड़, कज्जाड़ आदि उपजातियाँ हैं। सिक्खों व जैनियों में भी इसी प्रकार की उपजातियाँ हैं। भारत-विभाजन से अनेक पंजाबी, पाकिस्तानी और बंगाली भी यहाँ आ बसे हैं। संपूर्ण क्षेत्र में हिंदू तथा मुसलमानों का बाहुल्य है। यहाँ की भाषा हिन्दी है किंतु बोलचाल में हिन्दी की अनेक बोलियों के शब्द मिलते हैं।
जिले में कृषि उद्योग प्रमुख उद्योग है। ३३ प्रतिशत जनसंख्या इसी में कार्यरत है। रबी, ख़रीफ़, ज़ायद आदि प्रमुख फ़सलें होती हैं, जिनमें गन्ना, गेहूँ, चावल, मूँगफली की मुख्य उपज हैं। २५ प्रतिशत खेतिहर मजदूर हैं। इस प्रकार ५८ प्रतिशत जनसंख्या कृषि उद्योग से संबंधित है। अन्य कर्मकार ३७ प्रतिशत तथा पारिवारिक उद्योग में ५ प्रतिशत हैं। जिले का उत्तरी क्षेत्र सघन वनों से आच्छादित होने के कारण काष्ठ उद्योग विकसित अवस्था में मिलता है। नजीबाबाद, नहटौर, माहेश्वरी, धामपुर आदि स्थानों पर काष्ठ मंडिया हैं। करघा उद्योग यहाँ का तीसरा महत्त्वपूर्ण ग्रामोद्योग है। हथकरघे से बुने हुए कपड़े नहटौर के बाज़ार में बिकते हैं। यहाँ के बने कपड़े अन्यत्र भी निर्यात किए जाते हैं। पशुओं की अधिकता के कारण चर्म उद्योग में भी बहुत से लोग लगे हुए हैं। चमड़े एवं उससे निर्मित वस्तुओं के क्रय-विक्रय से अनेक व्यक्ति जीविकोपार्जन करते हैं। बिजनौर क्षेत्र की ११४८ हेक्टेयर भूमि स्थायी चरागाह के लिए है। इसलिए पशुपालन-उद्योग विकसित अवस्था में है। इसके अतिरिक्त मिट्टी के बर्तन बनाने का उद्योग जिसे कुम्हारगीरी का व्यवसाय भी कहते हैं, यहाँ एक प्रचलित व्यवसाय है।। लगभग सभी ग्राम-नगरों में मिट्टी के बर्तन बनानेवाले रहते हैं। अनेक लोग तेल उद्योग में लगे हुए हैं। तेली उपजाति के व्यक्तियों के अतिरिक्त भी इस उद्योग को करनेवाले पाए जाते हैं। नगरों में एक्सपेलर तथा ग्रामों में परंपरागत तेल कोल्हू से तेल निकालने का कार्य किया जाता है। इसके अतिरिक्त बाग़वानी जिसमें माली, कुँजड़े और बाग़बान (सानी) आदि उपजातियों के लोग कार्यरत हैं तथा मत्स्योद्योग अर्थात मछली पकड़ने का कार्य-व्यवसाय करनेवाले हैं जिसमें धींवर तुरकिये आदि उपजातियों के लोग हैं। इन्हें मछियारा तथा माहेगीर भी कहते हैं। अन्य प्रमुख लघु उद्योग हैं- बढ़ईगीरी, लुहारगीरी, सुनारगीरी, रँगाई-छपाई, राजगीरी, मल्लाहगीरी, ठठेरे का व्यवसाय, वस्त्र सिलाई का काम, हलवाईगीरी, दुकानदारी, बाँस की लकड़ी से संबंधित उद्योग, गुड़-खाँडसारी उद्योग, बटाई, बुनाई का काम, वनौषधि-संग्रह आदि।
दर्शनीय स्थल
कण्व आश्रम बिजनौर जनपद में अनेक ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल हैं जो इस जनपद की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं। इनमें महत्त्वपूर्ण स्थल है 'कण्व आश्रम'। अर्वाचीन काल में यह क्षेत्र वनों से आच्छादित था। मालिनी और गंगा के संधिस्थल पर रावली के समीप कण्व मुनि का आश्रम था, जहाँ शिकार के लिए आए राजा दुष्यंत ने शकुंतला के साथ गांधर्व विवाह किया था। रावली के पास अब भी कण्व आश्रम के स्मृति-चिह्न शेष हैं।
मेनका ताल गाँव मोहंदिया में मेनका ताल को जा भी देखा जा सकता है जिस तालाब में शकुन्तला कि अंगूठी गिरी थी ।
विदुरकुटी महाभारत काल का एक प्रसिद्ध स्थल है 'विदुरकुटी'। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण जब हस्तिनापुर में कौरवों को समझाने-बुझाने में असफल रहे थे तो वे कौरवों के छप्पन भोगों को ठुकराकर गंगा पार करके महात्मा विदुर के आश्रम में आए थे और उन्होंने यहाँ बथुए का साग खाया था। आज भी मंदिर के समीप बथुए का साग हर ऋतु में उपलब्ध हो जाता है।
दारानगर महाभारत का युद्ध आरंभ होनेवाला था, तभी कौरव और पांडवों के सेनापतियों ने महात्मा विदुर से प्रार्थना की कि वे उनकी पत्नियों और बच्चों को अपने आश्रम में शरण प्रदान करें। अपने आश्रम में स्थान के अभाव के कारण विदुर जी ने अपने आश्रम के निकट उन सबके लिए आवास की व्यवस्था की। आज यह स्थल 'दारानगर' के नाम से जाना जाता है। संभवत: महिलाओं की बस्ती होने के कारण इसका नाम दारानगर पड़ गया।
सेंदवार चाँदपुर के निकट स्थित गाँव 'सेंदवार' का संबंध भी महाभारतकाल से जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ है सेना का द्वार। जनश्रुति है कि महाभारत के समय पांडवों ने अपनी छावनी यही बनाई थी। गाँव में इस समय भी द्रोणाचार्य का मंदिर विद्यमान है।
पारसनाथ का किला बढ़ापुर से लगभग चार किलोमीटर पूर्व में लगभग पच्चीस एकड़ क्षेत्र में 'पारसनाथ का किला' के खंडहर विद्यमान हैं। टीलों पर उगे वृक्षों और झाड़ों के बीच आज भी सुंदर नक़्क़ाशीदार शिलाएँ उपलब्ध होती हैं। इस स्थान को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि इसके चारों ओर द्वार रहे होंगे। चारो ओर बनी हुई खाई कुछ स्थानों पर अब भी दिखाई देती है।
आजमपुर की पाठशाला चाँदपुर के पास बास्टा से लगभग चार किलोमीटर दूर आजमपुर गाँव में अकबर के नवरत्नों में से दो अबुल फ़जल और फैज़ी का जन्म हुआ था। उन्होंने इसी गाँव की पाठशाला में शिक्षा प्राप्त की थी। अबुल फ़जल और फैज़ी की बुद्धिमत्ता के कारण लोग आज भी पाठशाला के भवन की मिट्टी को अपने साथ ले जाते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस स्कूल की मिट्टी चाटने से मंदबुद्धि बालक भी बुद्धिमान हो जाते हैं।
मयूर ध्वज दुर्ग चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार जनपद में बौद्ध धर्म का भी प्रभाव था। इसका प्रमाण 'मयूर ध्वज दुर्ग' की खुदाई से मिला है। ये दुर्ग भगवान कृष्ण के समकालीन सम्राट मयूर ध्वज ने नजीबाबाद तहसील के अंतर्गत जाफरा गाँव के पास बनवाया था। गढ़वाल विश्वविद्यालय के पुरातत्त्व विभाग ने भी इस दुर्ग की खुदाई की थी।
हनुमान धाम- "बिजनोर शहर के पास स्थित किरतपुर शहर में हनुमान जी की ९० फुट ऊँची प्रतिमा है साथ में अन्य देवी देवताओ के मंदिर भी है जिनकी आस पास
के क्षेत्रों में काफी श्रद्धा है।
भरत भूमि से
Aayush Bhardwaj

Comments
Post a Comment